भोजन ही जीवन है

भोजन ही जीवन है

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स्वास्थ्य के वैदिक सिद्धान्त।

वैदिक साहित्य के सरताज, श्रीमद भागवत में लिखा गया है। ब्रह्मांड सघन हुआ। आकाशगंगा, सौर प्रणाली और ग्रहों की उत्पत्ति हुई। भौतिकता का जन्म हुआ। घरती ने कुछ हल्के प्राणी देखे, जो ब्रह्मांड में नीले नीलम के जैसे चमके। उन्होंने हमारे ग्रह में प्रबुद्ध प्राणियों के तौर पर रहना शुरू कर दिया।

मनु, सूर्य भगवान विवास्वत के पुत्र, और उनकी पत्नी  सतरुपा, घरती पर पहले व्यक्ति थे। उनकी राजसी सूरत थी, लंबे व पुष्ठ और अतुलनीय सौन्दर्य के स्वामी थे। उनका आकार हमारे आकर से बड़ा था। वे तीन मीटर तक लंबे थे। हमारे ग्रह की जलवायु लगातार गर्म रहती थी, एक कभी न खत्म होने वाला बसन्त था, ठीक वैसा ही जैसा वर्तमान में बैलिएरिक द्वीप में है। नदियां और घाराएं क्रिस्टल की तरह स्वच्छ और साफ थीं। हमारे ये पूर्वज इस अतुल्य अमृत के पोषण से कई पीढ़ियों तक जिंदा रहे। उन्हें न बीमारी, न युद्ध, और ना ही दुःख की जानकारी थी।

यह मानव जाति के पहले युग का जीवन था, जिसे संस्कृत में कृत्य- युग या सतयुग कहा जाता है। जैसे ही आकाशगंगा उत्पत्ति के केन्द्र से दूर हुई, अंधकार में मानव की चेतना घीरे-घीरे कम होती गयी। उत्पत्ति और मानव जाति के बीच सद्भाव की निरंतरता का पहला विभाजन हुआ। लोगों ने प्राकृतिक कानून के अनुरुप जीवन की उस गुणवतता को अधिक से अधिक खोना शुरू कर दिया। मानव जाति के इस दूसरे युग, त्रेता युग में, गतिविधि ने आध्यात्मिक प्रयास की जगह ले ली।

कृषि और पशु पालन शुरू हुआ। मानवजाति शाकाहारी बन गयी। अधिक ठोस भोजन ने इस समय दिखाई देने वाली पहली बीमारियों को जन्म दिया, ठीक उसी तरह जैसे बच्चे को पाचन समस्याएं होती है, जब वह दूध पीना छोड़ता है। जलवायु भी बदल गई। यह लोगों की तरह, रुखी और कठोर हो गयी। आयुर्वेद, जीवन का ज्ञान, जीवन को बचाने और स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण बन गया।

तीसरे युग, द्वापर-युग की शुरुआत में, पहला हिमयुग आया। मूल आवश्यकता के कारण, लोग शिकारी बन गए और पहली बार मांस खाया। मांस खाने से, जो उस समय की मानव जाति के साथ हुआ होगा, उससे पहली गंभीर बीमारियों और संघर्ष की उत्पत्ति

हुई। दूसरे युग के दौरान लोग मुख्य रूप से मेवे, सब्जियां, फलों, दूध उत्पादों, अनाज और दालों का सेवन करके भी जीवित रहे।

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चतुर्थ युग की शुरुआत में मांस खाने में वृद्धि हुई। चतुर्थ युग की शुरुआत लगभग 5000 साल पहले हुई और इसे कलियुग के रूप में जाना जाता है आज हम इस युग के अंत के करीब पहुंच रहे हैं। पीड़ा और युद्ध एक अनिवार्य वास्तविकता के रूप में देखा जाता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, जब जीवन की असीम क्षमता और रचनात्मकता युग बीतने के साथ-साथ अपनी पूर्ण क्षमता से लगभग 5-8% गिर गई थी! जीवन के अर्थ को पूरी तरह से भुला दिया गया था।

जीवन को खुशहाली का विस्तार बनाने की बजाय, यह स्वीकार कर लिया गया कि जीवन एक संघर्ष है और मनुष्य की यही भूल है। इन युगों में लोगों की औसत उम्र बहुत ज्यादा गिरती चली गयी। चतुर्थ युग की शुरुआत में लगभग लोग 20 वर्ष तक जीते थे। मध्य में, जब यीशु मसीह जीवित थे, औसत जीवन प्रत्याशा 30 साल थी, जो सबसे निचला स्तर था। आज यह वापिस करीब 75 साल तक पहुंच गयी है।

आज, चतुर्थ युग के अंत में, “क्वांटम लीप” से स्वर्ण युग फिर से वापसी होगी। हमारे समय की तीसरी सहतस्त्राब्दी की शुरुआत में, हम स्वयं को स्वर्ण युग में परिवर्तन काल के मध्य में पाते हैं जिसे वेद राम-राज या “पृथ्वी पर स्वर्ग” कहते हैं। (परिशिष्ट देखें)।

जैसा कि हमने देखा है, हमारे ग्रह के इस इतिहास के माध्यम से, भोजन एक दिव्य प्रकृति का है। शुरुआत में जीवित प्राणियों को अपना पोषण सीधे स्रोत से मिलता था। उसके बाद भोजन तेजी से रुखा बन गया। हालांकि, चाहे मोटा हो या महीन, हर भोजन में परम ऊर्जा है। हमारे भोजन से हम सूरज की ऊर्जा हमारे शरीर में एकीकृत करते हैं। इस पृथ्वी पर पूरा जीवन इस सौर ऊर्जा से अवतीर्ण/कमत्तर हो गया है।

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