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जीवन क्‍या है ?

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जन्म और मृत्यु के बीच की अवस्था का नाम जीवन है। जीवन को समझने से पूर्व जन्म और मृत्यु के कारणों को समझना आवश्यक होता है। जिसके कारण हमारा जीव विभिन्‍न योनियों में भ्रमण करता है। जन्म और मृत्यु क्यों ? कब? कैसे और कहाँ होती है ? उसका संचालन और नियन्त्रण कौन और कैसे करता है ? सभी की जीवन शैली, प्रज्ञा, सोच, विवेक, भावना, संस्कार, प्राथमिकताएँ, उद्देश्य, आवश्यकताएँ आयुष्य और मृत्यु का कारण और ढंग एक-सा क्‍यों नहीं होता? मृत्यु के पश्चात्‌ अच्छे से अच्छे चिकित्सक का प्रयास और जीवन दायिनी समझी जाने वाली दवाईयाँ क्‍यों प्रभावहीन हो जाती हैं? मृत्यु के पश्चात्‌ शरीर के कलेवर को क्‍यों जलाया, दफनाया अथवा अन्य किसी विधि द्वारा समाप्त किया जाता है ?

प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि-”मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ? मुझे मानव जन्म क्यों और कैसे मिला? मानव जीवन में भी सभी को एक-जैसी परिस्थितियाँ और वातावरण क्‍यों नहीं मिलते? सभी की आयु एक जैसी क्‍यों नहीं होती ? किसी की बुद्धि, मन, इन्द्रियों और शरीर का पूर्ण विकास होता है तो कुछ जन्म से ही अविकसित, असन्तुलित, विकलांग अथवा अस्वस्थ क्‍यों होते हैं? जन्म के साथ परिवार, समाज, धर्म और संस्कृति, परिस्थितियाँ, कार्यक्षेत्र तथा जीवन को प्रभावित करने वाले विभिन्‍न प्रसंगों का संयोग अथवा वियोग क्‍यों मिलता है? जीवन चलाना तो प्राय: सभी योनि के जीव जानते हैं। परन्तु जीवन को सार्थक केसे बनाना, यह केवल मानव जीवन में ही संभव होता है। सृष्टि में मानव ही एक ऐसा प्राणी है जिसको पाँचों इन्द्रियों के साथ मन, मस्तिष्क, चेतना और विवेक की सर्वोच्य अवस्था प्राप्त होती है, जिसमें जीवन का सर्वाधिक विकास सम्भव होता है। मानव इसी कारण सम्यक्‌ चिन्तन कर अपनी क्षमताओं को पहचान, उसके अनुरूप जीवन का लक्ष्य बना जीवन जी सकता है।

मानव जीवन अमूल्य है:-

मानव जीवन अमूल्य है। वस्तु जितनी मूल्यवान होती है, उसका उपयोग उसके अनुरूप करने वाला ही सच्चा ज्ञानी होता है। लाखों रुपये मासिक वेतन पाने वाले कारखाने के किसी मेनेजर को झाड़ू लगाने का कार्य लेने वाले को व्यावहारिक जगत में हम बुद्धिमान नहीं कहते। चाय की जो प्याली पाँच रुपए में मिलती है, उसके लिए हजार रुपए देने वाला ना-समझ होता है। वे सभी व्यक्ति बुद्धिमानों की श्रेणी में नहीं आते जो जानते हैं कि
अमुक प्रवृत्ति उनके स्वास्थ्य अथवा जीवन के लिए हानिकारक है, फिर भी उनसे नहीं बचते और जो यह जानते है कि अमुक प्रवृत्तियों से शांति मिलती है, तनाव दूर होता है, निर्भयता आती है, स्वास्थ्य अच्छा रहता है, फिर भी उनकी उपेक्षा करते हैं। हमें चिन्तन करना होगा कि मानव जीवन के रूप में प्राप्त हम अपनी ऐसी अमूल्य क्षमताओं का अप्राथमिक, अनावश्यक कार्यों में दुरूपयोग और अपव्यय तो नहीं कर रहे हैं? मानव योनि को व्यर्थ में ही बर्बाद तो नहीं कर रहे हैं, ताकि भविष्य में अपनी मूर्खता पर पछताना पड़े ? जब तक अपनी क्षमताओं का सही उपयोग नहीं होगा, दुःख और रोग के कारणों को नहीं समझा जाएगा तब तक हमारा जीवन अमर्यादित, अनियन्त्रित, लक्ष्य-हीन, स्वच्छन्द, असंयमित होने से स्थायी स्वास्थ्य प्राप्त नहीं हो सकता।

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स्वास्थ्य क्या है ?

स्वास्थ्य के मूल सिद्धान्तों का अध्ययन करने से पूर्व तथा स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले विभिन्‍न तथ्यों की चर्चा करने से पूर्व स्वास्थ्य क्या होता हैं और रोग किन-किन कारणों से हो सकते हैं? उनको जानना और समझना आवश्यक है- ताकि स्वास्थ्य के अनुरूप जीवन शैली अपनायी जा सके और रोग के कारणों से यथा-सम्भव बच्चा जा सके। मृत्यु के लिए सौ सर्पों के काटने की आवश्यकता नहीं होती। एक सर्प का काटा व्यक्ति भी कभी-कभी मर सकता है। ठीक उसी प्रकार कभी-कभी बहुत छोटी लगने वाली हमारी गलती अथवा उपेक्षावृत्ति भी भविष्य में रोग का बहुत बड़ा कारण बन जीवन की प्रसन्‍नता-आनन्द सदैव के लिए समाप्त कर देती है।

संदर्भ : Dr. C.M. Chorida